This is a humble collection of songs of Sahir Ludhianvi, the greatest lyricist, Bollywood has ever seen. Sahir used his songs for spreading message of love for humankind through philosophical notes or social commentary. He also used some of his ghazals & nazms in his movies also by simplifying them. For selecting a song of their choice, readers may type the name of song, movie, singer, composer etc in the SEARCH column on right side, or use the Labels on left side of page.
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January 25, 2021
January 23, 2021
January 19, 2021
January 17, 2021
January 16, 2021
August 13, 2018
'मेरे गीत तुम्हारे' का दूसरा संस्करण
साहिर पर मेरी पुस्तक 'मेरे गीत तुम्हारे' का दूसरा संस्करण प्रकाशित हो चुका है। पेपर बैक और हार्ड बाउंड, दोनों । पहला संस्करण 2016 में आया था । दो साल बीतते-बीतते दूसरा संस्करण आना एक लेखक के तौर पर मेरे लिए सुकून भरा अहसास है कि इस दौर में भी किताबें पढ़ी जा रही हैं, और इनमें यह किताब भी शामिल है । कई पत्रिकाओं, समाचार पत्रों ने इस पर समीक्षाएं भी प्रकाशित की थीं, उनमें से कुछ का जिक्र पुस्तक के बैककवर पर किया गया है। नए संस्करण में कुछ गीत भी जोड़े गए हैं, जिससे पृष्ठों की संख्या भी बढ़ गई है । सभी मित्रों-परिचितों-पाठकों का इस पुस्तक को इतना प्यार देने से लिए शुक्रिया!
Labels:
Book,
Mere Geet Tumhare,
NOTE ON SAHIR,
पुस्तक,
मेरे गीत तुम्हारे,
साहिर लुधियानवी
January 28, 2018
November 16, 2017
August 13, 2017
यूं तो हमने लाख हसीं देखे हैं (तुम सा नहीं देखा -1957) Yun to hamne lakh hasin dekhe hain (Tumsa Nahin Dekha - 1957)
यूं तो हमने लाख हसीं देखे
हैं
तुम सा नहीं देखा
उफ! ये नज़र, उफ! ये अदाकौन न अब होगा फिदा
ज़ुल्फें हैं या बदलियां
आंखें हैं या बिजलियां
जाने किस-किसकी आएगी क़ज़ा
Note: इस फिल्म में सिर्फ एक ही गीत साहिर का है, बाकी सभी गीत मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे हैं |
(Composer : O.P.Nayyar, Singer Md. Rafi, Director : Nasir Hussain, Actor : Shammi Kapoor, Ameeta)
तुम सा नहीं देखा
उफ! ये नज़र, उफ! ये अदाकौन न अब होगा फिदा
ज़ुल्फें हैं या बदलियां
आंखें हैं या बिजलियां
जाने किस-किसकी आएगी क़ज़ा
Note: इस फिल्म में सिर्फ एक ही गीत साहिर का है, बाकी सभी गीत मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे हैं |
(Composer : O.P.Nayyar, Singer Md. Rafi, Director : Nasir Hussain, Actor : Shammi Kapoor, Ameeta)
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Tumsa Nahin Dekha
July 30, 2017
पैसे की कहानी ( गर्ल फ्रेंड - 1960) Paise ki kahani (Girl Friend - 1960)
कहते हैं इसे पैसा बच्चों, ये चीज़ बड़ी मामूली है
लेकिन इस पैसे के पीछे सब दुनिया रस्ता भूली है
इंसां की बनाई चीज़ है ये, लेकिन इंसान पे भारी हैं
हल्की-सी झलक इस पैसे की धर्म और ईमान पे भारी है
ये झूठ को सच कर देता है और सच को झूठ बनाता है
भगवान नहीं, पर हर घर में भगवान की पदवी पाता है
इस पैसे के बदले दुनिया में इंसानों की मेहनत बिकती है
जिस्मों की हरारत बिकती है, रूहों की शराफ़त बिकती है
सरदार खरीदे जाते हैं, दिलदार खरीदे जाते हैं
मिट्टी के सही पर इससे ही अवतार खरीदे जाते हैं
इस पैसे की खातिर दुनिया में आबाद वतन बंट जाते हैं
धरती टुकड़े हो जाती हैं, लाशों के कफ़न बंट जाते हैं
इज़्ज़त भी इससे मिलती है, ताज़ीम भी इससे मिलती है
तहज़ीब भी इससे आती है, तालीम भी इससे मिलती है
हम आज तुम्हें इस पैसे का सारा इतिहास बताते हैं
कितने जुग अब तक गुज़रे हैं, उन सबकी झलक दिखलाते हैं
इक ऐसा वक़्त भी था जग में, जब इस पैसे का नाम न था
चीज़ें चीज़ों से तुलती थीं, चीजों का कुछ भी दाम न था
इंसान फकत इंसान था तब, इंसान का मजहब कुछ भी न था
दौलत, गुरबत, इज्ज़त, ज़िल्लत, इन लफ्जों का मतलब कुछ भी न था
चीज़ों से चीज़ बदलने का ये ढंग बहुत बेकार-सा था
लाना भी कठिन था चीज़ों का, ले जाना भी दुश्वार-सा था
इंसान ने तब मिलकर सोचा – क्यूं वक़्त इतना बरबाद करें
हर चीज़ की जो कीमत ठहरे, वो चीज़ न क्यूं ईज़ाद करें
इस तरह हमारी दुनिया में पहला पैसा तैयार हुआ
और इस पैसे की हसरत में इंसान ज़लील-ओ-ख़्वार हुआ
पैसे वाले इस दुनिया में जागीरों के मालिक बन बैठे
मज़दूरों और किसानों की तक़दीरों के मालिक बन बैठे
जागीरों पे कब्जा रखने को कानून बने, हथियार बने
हथियारों के बल पर धनवाले इस धरती के सरदार बने
जंगों में लड़ाया भूखों को और अपने सर पर ताज रखा
निर्धन को दिया परलोक का सुख, अपने लिये जग का राज रखा
पंडित और मुल्ला इनके लिए मज़हब के सहीफ़े लाते रहे
शायर तारीफ़ें लिखते रहे, गायक दरबारी गाते रहे
वैसा ही करेंगे हम
जैसा तुझे चाहिए
पैसा हमें चाहिए !
हल तेरे जोतेंगे, खेत तेरे बोएंगे
ढोर तेरे हाकेंगे, बोझ तेरा ढोएंगे
पैसा हमें चाहिए !
पैसा हमें दे दे राजा गुन तेरे गायेंगे
तेरे बच्चे बच्चियों का खैर मनायेंगे
पैसा हमें चाहिए !
लोगों की अनथक मेहनत ने चमकाया रूप ज़मीनों का
भाप और बिजली हमराह लिए, आ पहुंचा दौर मशीनों का
इल्म और बिज्ञान की ताक़त ने मुंह मोड़ दिया दरियाओं का
इंसान जो खाक का पुतला था, वो हाकिम बना हवाओं का
जनता की मेहनत के आगे कुदरत ने खजाने खोल दिये
राजों की तरह रखा था जिन्हें, वो सारे जमाने खोल दिये
लेकिन इन सब ईजादों पर पैसे का इज़ारा होता रहा
दौलत का नसीबा चमक उठा, मेहनत का मुकद्दर सोता रहा
वैसा ही करेंगे हम
जैसा तुझे चाहिए
पैसा हमें चाहिए !
रेलें भी लगाएंगे, मिलें भी चलाएंगे
जंगों में भी जाएंगे, जाने भी गवाएंगे
पैसा हमें चाहिए !
पैसा हमें दे दे बाबू गुण तेरे गायेंगे
तेरे बच्चे बच्चियों का खैर मनायेंगे
पैसा हमें चाहिये!
जुग-जुग से यूं ही इस दुनिया में हम दान के टुकड़े मांगते हैं
हल जोत के, फ़सलें काट के भी पकवान के टुकड़े मांगते हैं
लेकिन इन भीख के टुकड़ों से कब भूख का संकट दूर हुआ
इंसान सदा दुख झेलेगा गर खत्म न ये दस्तूर हुआ
जंजीर बनी है कदमों की, वो चीज़ जो पहले गहना थी
भारत के सपूतों! आज तुम्हें बस इतनी बात ही कहना थी
जिस वक़्त बड़े हो जाओ तुम, पैसे का राज मिटा देना
अपना और अपने जैसों का जुग-जुग का कर्ज़ चुका देना
जुग-जुग का कर्ज़ चुका देना !
नोट : इस गीत को कुछ हिस्से नीचे दिये औडियो में नहीं हैं | इन्हें हमने साहिर के गीतों के संकलन ‘गाता जाए बंजारा’ से लिया है |
लेकिन इस पैसे के पीछे सब दुनिया रस्ता भूली है
इंसां की बनाई चीज़ है ये, लेकिन इंसान पे भारी हैं
हल्की-सी झलक इस पैसे की धर्म और ईमान पे भारी है
ये झूठ को सच कर देता है और सच को झूठ बनाता है
भगवान नहीं, पर हर घर में भगवान की पदवी पाता है
इस पैसे के बदले दुनिया में इंसानों की मेहनत बिकती है
जिस्मों की हरारत बिकती है, रूहों की शराफ़त बिकती है
सरदार खरीदे जाते हैं, दिलदार खरीदे जाते हैं
मिट्टी के सही पर इससे ही अवतार खरीदे जाते हैं
इस पैसे की खातिर दुनिया में आबाद वतन बंट जाते हैं
धरती टुकड़े हो जाती हैं, लाशों के कफ़न बंट जाते हैं
इज़्ज़त भी इससे मिलती है, ताज़ीम भी इससे मिलती है
तहज़ीब भी इससे आती है, तालीम भी इससे मिलती है
हम आज तुम्हें इस पैसे का सारा इतिहास बताते हैं
कितने जुग अब तक गुज़रे हैं, उन सबकी झलक दिखलाते हैं
इक ऐसा वक़्त भी था जग में, जब इस पैसे का नाम न था
चीज़ें चीज़ों से तुलती थीं, चीजों का कुछ भी दाम न था
इंसान फकत इंसान था तब, इंसान का मजहब कुछ भी न था
दौलत, गुरबत, इज्ज़त, ज़िल्लत, इन लफ्जों का मतलब कुछ भी न था
चीज़ों से चीज़ बदलने का ये ढंग बहुत बेकार-सा था
लाना भी कठिन था चीज़ों का, ले जाना भी दुश्वार-सा था
इंसान ने तब मिलकर सोचा – क्यूं वक़्त इतना बरबाद करें
हर चीज़ की जो कीमत ठहरे, वो चीज़ न क्यूं ईज़ाद करें
इस तरह हमारी दुनिया में पहला पैसा तैयार हुआ
और इस पैसे की हसरत में इंसान ज़लील-ओ-ख़्वार हुआ
पैसे वाले इस दुनिया में जागीरों के मालिक बन बैठे
मज़दूरों और किसानों की तक़दीरों के मालिक बन बैठे
जागीरों पे कब्जा रखने को कानून बने, हथियार बने
हथियारों के बल पर धनवाले इस धरती के सरदार बने
जंगों में लड़ाया भूखों को और अपने सर पर ताज रखा
निर्धन को दिया परलोक का सुख, अपने लिये जग का राज रखा
पंडित और मुल्ला इनके लिए मज़हब के सहीफ़े लाते रहे
शायर तारीफ़ें लिखते रहे, गायक दरबारी गाते रहे
वैसा ही करेंगे हम
जैसा तुझे चाहिए
पैसा हमें चाहिए !
हल तेरे जोतेंगे, खेत तेरे बोएंगे
ढोर तेरे हाकेंगे, बोझ तेरा ढोएंगे
पैसा हमें चाहिए !
पैसा हमें दे दे राजा गुन तेरे गायेंगे
तेरे बच्चे बच्चियों का खैर मनायेंगे
पैसा हमें चाहिए !
लोगों की अनथक मेहनत ने चमकाया रूप ज़मीनों का
भाप और बिजली हमराह लिए, आ पहुंचा दौर मशीनों का
इल्म और बिज्ञान की ताक़त ने मुंह मोड़ दिया दरियाओं का
इंसान जो खाक का पुतला था, वो हाकिम बना हवाओं का
जनता की मेहनत के आगे कुदरत ने खजाने खोल दिये
राजों की तरह रखा था जिन्हें, वो सारे जमाने खोल दिये
लेकिन इन सब ईजादों पर पैसे का इज़ारा होता रहा
दौलत का नसीबा चमक उठा, मेहनत का मुकद्दर सोता रहा
वैसा ही करेंगे हम
जैसा तुझे चाहिए
पैसा हमें चाहिए !
रेलें भी लगाएंगे, मिलें भी चलाएंगे
जंगों में भी जाएंगे, जाने भी गवाएंगे
पैसा हमें चाहिए !
पैसा हमें दे दे बाबू गुण तेरे गायेंगे
तेरे बच्चे बच्चियों का खैर मनायेंगे
पैसा हमें चाहिये!
जुग-जुग से यूं ही इस दुनिया में हम दान के टुकड़े मांगते हैं
हल जोत के, फ़सलें काट के भी पकवान के टुकड़े मांगते हैं
लेकिन इन भीख के टुकड़ों से कब भूख का संकट दूर हुआ
इंसान सदा दुख झेलेगा गर खत्म न ये दस्तूर हुआ
जंजीर बनी है कदमों की, वो चीज़ जो पहले गहना थी
भारत के सपूतों! आज तुम्हें बस इतनी बात ही कहना थी
जिस वक़्त बड़े हो जाओ तुम, पैसे का राज मिटा देना
अपना और अपने जैसों का जुग-जुग का कर्ज़ चुका देना
जुग-जुग का कर्ज़ चुका देना !
नोट : इस गीत को कुछ हिस्से नीचे दिये औडियो में नहीं हैं | इन्हें हमने साहिर के गीतों के संकलन ‘गाता जाए बंजारा’ से लिया है |
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NOTE ON SAHIR
July 10, 2017
तेरा हाथ हाथ में हो अगर (कभी कभी -1976) Tera Haath haath men ho agar (Kabhi Kabhi-1976)
तेरा हाथ हाथ में हो अगर
तो सफर ही असले-हयात है
मेरे हर कदम पे हैं मंज़िलें, तेरा
प्यार गर मेरे साथ है
मेरी बात का मेरी हमनफस तू जवाब दे कि न दे मुझे
तेरी एक चुप में जो है छुपी, वो
हज़ार बातों की बात है
मेरी ज़िंदगी का हर एक पल तेरे हुस्न से है जुड़ा हुआ
तेरे होंठ थिरके तो सुबह है तेरी जुल्फ बिखरे तो रात है
(Note on Sahir : इस ग़ज़ल
को फिल्म के पहले सीन में अमिताभ बच्चन की आवाज़ में फिल्माया गया था |)
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Rakhi
June 19, 2017
An artcle on Bharat Bhushan by Sahir Ludhianvi : Filfare, 1961
It was during the planning stages of “Barsaat ki Raat” that we saw much of
each other. Sitting to discuss the story of the film, its characters and other
preliminaries afforded me an opportunity of knowing the man. Simplicity is his
virtue; so is humility. Everyone who knows Bharat superficially tells me that
he has one great failing—that of never being able to muster courage to say ‘no’
to anyone or anything. But I know to the contrary. It is not because of lack of
courage, but because life has mellowed him to the point of never wanting to
inflict pain. When, on rare occasions, he does say ‘no’ to someone, he is as
firm as a rock, while at the same time remaining gentle as a lamb.
Bharat is the supreme example of an Introvert. He is always
withdrawn and mostly takes refuge in a book. He is a man of few words, but when
he speaks, he impresses the listener deeply. To my mind Bharat’s personality
has been greatly influenced by the biographical roles he has played. There is
Kabir, the mystic poet-saint; Ghalib, the eloquent poet with a life time
devoted to the flavor of wine and the music of words; Chaitanya, the great
founder of the Krishna bhakti cult; Baiju, the singer who sang from his heart
and loved with his soul; and Kalidasa, Sanskrit’s supreme poet. While playing
the parts of these great men of the past, Bharat had an invaluable opportunity
to probe deeper into their hearts and souls; study their character, mannerisms
and the stuff they were made of. This in turn influenced his personality to a
great extent.
Whenever the youth of today calls to mind Kabir, Kalidasa,
Ghalib or Chaitanya, he immediately thinks of Bharat.
Once a film producer asked me for my photograph and I gave him
one from my album. On seeing the photo he said: “You don’t look like a poet in
it.” To this I had only one reply. “If you want a poet’s photo,” I said, “take
one of Bharat.”
His knowledge is profound, but he seldom displays it. I
remember a recent gathering at his residence when the topic of nuclear science
came up for discussion. The discussion was obscure to all the persons present,
but, curiously enough, Bharat was an interested listener. I thought he was
merely trying not to appear an ignoramus. He proved me wrong by interposing a
remark couched in such scientific terms that everyone looked at him in
surprise. Later on, he shamefacedly confessed to me that included in his
leisure- time reading were two or three scientific journals to which he was a
regular subscriber.
His collection of books is already a legend. His house is more
like a library than a home. This brings to my mind an incident which happened
not long ago. I was waiting for Bharat in his living-room. At last he returned
from his work. I asked him jokingly, “Whom do you want?” He paused a little and
said: “You are entitled to ask this question because this house looks more as
if it belongs to a writer than to a film star”
For years he has been in a position to ‘show off’ and throw his
weight around. But he has always risen above the cheap temptation to swank and
brag. He is allergic to social functions and crowds, also to suits and boots. A
simple shirt, a white trouser, a pair of chappals, have practically ruined his
social career!
Since his wife’s death Bharat has been lonely and the impression
one receives of meeting a sad, isolated man seems to have deepened. But no one
will deny that the man has borne his loss with the characteristic stoicism of
the philosopher. His devotion to his two daughters is tantamount to an
obsession worthy of going down in folklore. The absence of a life partner is
felt—sometimes acutely— but there is a strong disinclination to fill the void
in a hurry.
No two children could wish for a more considerate father. To be
capable of such extreme self-effacement, to be so careless of one’s own needs
and happiness, one has to be more than an ordinary man. One has to be a Bharat
Bhushan.
I wish I had a rupee to give myself for every song I have
conceived and written in the solitude of Bharat Bhushan's house — the one haven
of peace and calm for me ... - Sahir Ludhianvi
Whenever he finds time, he takes his children to the nearby
garden, to the sea-shore or the zoo, without even worrying that his numerous
fans would mob him. Once he had taken his children to the zoo and was telling
them, “This is an elephant and that one over there is a camel,” when he heard a
chorus: “And this is Bharat Bhushan.” A crowd of youngsters had gathered around
him and he was unaware of it till he heard his name.
At home he spends as much time with his daughters as he can,
reading children’s stories to them or playing games with them.
And that is how I have come to regard Bharat Bhushan in almost
every aspect. To me he is an extraordinary human being. Right from the way he
receives his dinner guests down to his treatment of his domestics, the man
displays patience, kindliness, generosity, considerateness and cool aplomb.
There is at least one excellent reason which accounts for the
strong affinity between Bharat and me. We are both shy of public and social
functions. But while I am blunt and outspoken in my antipathy to these
functions, Bharat is tactful and diplomatic.
But there is another strange reason why I am so fond of Bharat
Bhushan and seek him out so much and so frequently. Poetry, you see, hates
Noise. It seeks, loves and epitomizes Silence. And in no other man do I find
silence cultivated to such a fine art. I find inspiration in his unremitting
worship of Silence, in his uncompromising disdain of Noise.
Bharat is a genuine lover of poetry. His library is stocked with all the celebrated poets’ diwans and it is amazing how much he remembers of them. I was once trying to recite a poem of my own at his house and got stuck at a point. With the air of a man apologizing for the interruption, up came Bharat with the missing words. You might have thought he had read the poem yesterday! Or written it!
Bharat is a genuine lover of poetry. His library is stocked with all the celebrated poets’ diwans and it is amazing how much he remembers of them. I was once trying to recite a poem of my own at his house and got stuck at a point. With the air of a man apologizing for the interruption, up came Bharat with the missing words. You might have thought he had read the poem yesterday! Or written it!
Most film producers who engage me to write their songs are generally eager and anxious to give me all possible comforts and aids to good writing—a solitary, cool, well-furnished room, good food and so forth. But I wish I had a rupee to give myself for every song I have conceived and written in the solitude of Bharat Bhushan’s house—the one haven of peace and calm I most love to retire to, for work or pleasure. And the greatest single factor that contributes most largely to this peace and quiet, this blessed, ennobling, invigorating, activating silence is Bharat Bhushan himself!
Wherever he is, he becomes an island of Silence and it is in this island that I most yearn to take my poet’s refuge.
Courtsey : Shyam Goel - https://www.facebook.com/groups/550861121725169/permalink/1272058646272076/
(This article was written
by Sahir Ludhianvi in 1961).
January 24, 2017
मुख्यधारा का साहित्य सिनेमा को मनोरंजन मानता है
जागरण
संवाददाता, देहरादून:
साहित्यकार सुनील भट्ट की किताब 'साहिर लुधियानवी : मेरे गीत तुम्हारे'
पर आयोजित विमर्श में कहा गया कि साहित्य सृजन पर मुख्यधारा के ¨हिन्दी साहित्य का एकाधिकार नहीं
हैं।
जिस सिनेमा और गीतों को मुख्यधारा का साहित्य महज मनोरंजन मानता है, वह भी
साहित्य सृजन का सशक्त माध्यम हैं। जरूरत सिर्फ अपना नजरिया दुरुस्त करने की है।
धाद संस्था के एकांश के माध्यम से
रेसकोर्स स्थित ऑफिसर्स ट्रांजिट हॉस्टल में आयोजित विमर्श में कथाकार मुकेश नौटियाल
ने सुनील भट्ट की कृति के माध्यम से सिनेमा के साहित्यिक पहलुओं को सामने रखा।
उन्होंने कहा कि 'साहिर लुधियानवी : मेरे
गीत तुम्हारे' ने मुख्यधारा के ¨हिन्दी
साहित्य की एकाधिकार की जमीन को तर्कपूर्ण ढंग से तोड़ने की कोशिश की है। उन्होंने ¨हिन्दी सिनेमा
जगत के गीतकारों, सिक्रप्ट लेखकों और फिल्मकारों पर अधिक से
अधिक लिखने की वकालत भी की। दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर रिसर्च एसोसिएट मनोज
पंजानी ने कहा कि तमाम गीतकारों का जिक्र करते हुए कहा कि इनके माध्यम से समाज को
तमाम अर्थपूर्ण गीत मिले हैं। कई बार गीतों के माध्यम से साहित्य और प्रासंगिक भी
नजर आता है।
कार्यक्रम
में अर्चना राय हरेंद्र परिहार व जन संवाद समिति के सांस्कृतिक दल ने साहिर के
गीतों की संगीतमय प्रस्तुति दी। धाद के प्रतिनिधि तन्मय ममगाईं ने बताया कि 20-21 मार्च
को दून में बाल साहित्य पर भी बड़ा विमर्श आयोजित किया जा रहा है। इसका मकसद नई
पीढ़ी को सृजनशील बनाना है। विमर्श में डॉ. जयंत नवानी, लोकेश
नवानी, नीलम प्रभा वर्मा, सुनीता चौहान,
अंबर खरबंदा, कांता घिल्डियाल, सविता जोशी आदि उपस्थित रहे।
By Publish Date: Sun, 22 Jan 2017 09:12 PM (IST) | Updated Date:Sun, 22 Jan 2017
09:12 PM (IST)
June 15, 2016
साहिर के गीतों को आधार बनाकर रची गई मेरी पुस्तक ‘साहिर लुधियानवी : मेरे गीत तुम्हारे’ के कुछ अंश
फ़िल्मी दुनिया में साहित्य से जुड़े कई सफल लोगों ने जोर
आजमाईश की, पर उन्हें वह
सफलता नहीं मिल पाई जो साहिर को नसीब
हुयी । इसका एक कारण तो यह था कि ये लोग फिल्म के फॉरमेट को ठीक से पकड़ नहीं पाए
। एक फिल्म लेखक या गीतकार को कई बंधनों में रहकर काम करना होता है । उसे
फिल्म की कहानी, पात्रों के परिवेश, नायक-नायिका की इमेज, प्रचलित गीत-संगीत, निर्माता-निर्देशक
की पसंद-नापसंद सबका ख्याल रखना होता है । जाहिर है, इतने बंधनों में रहकर
काम करना
काफी मुश्किल है । इसलिए कोई हैरानी यहीं कि जिन लोगों ने साहित्य के
क्षेत्र में नाम व शोहरत कमाई, वे मुंबई में चल नहीं पाए
और निराश होकर या मोहभंग करा कर वापस चले गए
। साहिर के मामले में ऐसा नहीं हुआ क्योंकि उन्होंने फ़िल्मी गीतों की इन
सीमाओं को पहचान लिया । उन्होंने इन बंधनों का रोना नहीं
रोया, बल्कि उसे स्वीकार कर
लिया । ये बंधन उनकी सीमा-रेखा बन गए । उन्होंने मान लिया कि अब जो भी खेल करना है, इसी में करना है । और उन्होंने खेल किया
और खूब किया
साहिर के कैरियर के पहले दौर की सफलता का बड़ा कारण उनकी धुनों
के हिसाब से गीत लिख पाने की क्षमता थी । धुन की रिदम से मिलते-जुलते शब्द चुनना
और उन्हें ऐसे वाक्यों में पिरोना कि एक निश्चित समय-सीमा में
फिट हो सकें, एक जटिल काम है । यह काम और भी मुश्किल हो जाता
है जब कोई गीतकार अच्छा गीत लिखने की तमन्ना रखता हो । अपने अहसास और विचारों की
गहराई को बनी-बनाई धुनों में बांधने का काम साहिर खूब
किया और बहुत खूबसूरती से किया । साहिर की इस काव्य
प्रतिभा के बारे में फ़िल्मी गीतकार व शायर जां निसार अख्तर कहते हैं, "अल्फ़ाज़ और जज़्बात की खूबसूरती गीतों के लिए बड़ी अहम है । जो धुन साहिर को 'सुन जा दिल की
दास्तां' के लिये दी गयी होगी, उस पर 'आ जा, आ जा बलमा' भी दिया जा
सकता था, लेकिन यहीं पर एक शायर और तुकबंद का फर्क सामने आता
है ।"
April 27, 2016
वतन की आबरू खतरे में है, हुशियार हो जाओ
वतन
की आबरू खतरे में है,
हुशियार हो जाओ
हमारे इम्तहां का वक़्त है, तैयार हो जाओ
उठो रुख फेर दो दुश्मन की तोपों के दहानों का
वतन की सरहदों पर आहनी दीवार हो जाओ
हुशियार हो जाओ, वतन की आबरू खतरे में है
वो जिनकी गरदनों में हार बाहों का पहनाया था
अब उनकी गरदनों के वास्ते तलवार हो जाओ
हुशियार हो जाओ, वतन की आबरू खतरे में है
इसी को ज़िंदगी देंगे, इसी से ज़िंदगी पाई
लहू के रंग से लिखा हुआ इकरार हो जाओ
वतन की आबरू खतरे में है, हुशियार हो जाओ
हमारी कौम पर तारीख तोहमत धर नहीं पाये
वतन-दुश्मन दरिंदों के लिए ललकार हो जाओ
वतन की आबरू खतरे में है, हुशियार हो जाओ
हमारे इम्तहां का वक़्त है, तैयार हो जाओ
हमारी
सरहदों पर खून बहता हैं जवानों का
हुआ
जाता है दिल छलनी हिमाला की चट्टानों का उठो रुख फेर दो दुश्मन की तोपों के दहानों का
वतन की सरहदों पर आहनी दीवार हो जाओ
हुशियार हो जाओ, वतन की आबरू खतरे में है
वो
जिनको सादगी में हमने आँखों पर बिठाया था
जो
जिनको भाई कहकर हमने सीने से लगाया था वो जिनकी गरदनों में हार बाहों का पहनाया था
अब उनकी गरदनों के वास्ते तलवार हो जाओ
हुशियार हो जाओ, वतन की आबरू खतरे में है
न
हम इस वक़्त हिन्दू हैं न मुस्लिम हैं न ईसाई
अगर
कुछ हैं तो हैं इस देश,
इस धरती के शैदाई इसी को ज़िंदगी देंगे, इसी से ज़िंदगी पाई
लहू के रंग से लिखा हुआ इकरार हो जाओ
वतन की आबरू खतरे में है, हुशियार हो जाओ
खबर
रखना कोई गद्दार साजिश कर नहीं पाये
नजर
रखना कोई ज़ालिम तिजोरी भर नहीं पाये हमारी कौम पर तारीख तोहमत धर नहीं पाये
वतन-दुश्मन दरिंदों के लिए ललकार हो जाओ
वतन की आबरू खतरे में है, हुशियार हो जाओ
NOTE ON SAHIR : यह गीत साहिर ने 1962 के भारत-चीन
युद्ध के दौरान लिखा था | इसका संगीत खैय्याम साहब ने दिया था |
March 27, 2016
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