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January 24, 2017

साहिर के बहाने............ धाद साहित्य एकांश का विमर्श : 22 जनवरी 2017 , देहरादून


साहिर के बहाने : धाद साहित्य एकांश का विमर्श : 22 जनवरी 2017 , देहरादून


मुख्यधारा का साहित्य सिनेमा को मनोरंजन मानता है

 जागरण संवाददाता, देहरादून:    

साहित्यकार सुनील भट्ट की किताब 'साहिर लुधियानवी : मेरे गीत तुम्हारे' पर आयोजित विमर्श में कहा गया कि साहित्य सृजन पर मुख्यधारा के ¨हिन्दी  साहित्य का एकाधिकार नहीं हैं। जिस सिनेमा और गीतों को मुख्यधारा का साहित्य महज मनोरंजन मानता है, वह भी साहित्य सृजन का सशक्त माध्यम हैं। जरूरत सिर्फ अपना नजरिया दुरुस्त करने की है।

धाद संस्था के एकांश के माध्यम से रेसकोर्स स्थित ऑफिसर्स ट्रांजिट हॉस्टल में आयोजित विमर्श में कथाकार मुकेश नौटियाल ने सुनील भट्ट की कृति के माध्यम से सिनेमा के साहित्यिक पहलुओं को सामने रखा। उन्होंने कहा कि 'साहिर लुधियानवी : मेरे गीत तुम्हारे' ने मुख्यधारा के ¨हिन्दी साहित्य की एकाधिकार की जमीन को तर्कपूर्ण ढंग से तोड़ने की कोशिश की है। उन्होंने ¨हिन्दी सिनेमा जगत के गीतकारों, सिक्रप्ट लेखकों और फिल्मकारों पर अधिक से अधिक लिखने की वकालत भी की। दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर रिसर्च एसोसिएट मनोज पंजानी ने कहा कि तमाम गीतकारों का जिक्र करते हुए कहा कि इनके माध्यम से समाज को तमाम अर्थपूर्ण गीत मिले हैं। कई बार गीतों के माध्यम से साहित्य और प्रासंगिक भी नजर आता है।

कार्यक्रम में अर्चना राय हरेंद्र परिहार व जन संवाद समिति के सांस्कृतिक दल ने साहिर के गीतों की संगीतमय प्रस्तुति दी। धाद के प्रतिनिधि तन्मय ममगाईं ने बताया कि 20-21 मार्च को दून में बाल साहित्य पर भी बड़ा विमर्श आयोजित किया जा रहा है। इसका मकसद नई पीढ़ी को सृजनशील बनाना है। विमर्श में डॉ. जयंत नवानी, लोकेश नवानी, नीलम प्रभा वर्मा, सुनीता चौहान, अंबर खरबंदा, कांता घिल्डियाल, सविता जोशी आदि उपस्थित रहे।

By  Publish Date: Sun, 22 Jan 2017 09:12 PM (IST) | Updated Date:Sun, 22 Jan 2017 09:12 PM (IST)


‘साहिर के बहाने’ कार्यक्रम में भाग लेते साहित्यकार

सुनील भट्ट की पुस्तक साहिर लुधियानवी-मेरे गीत तुम्हारे पर किया मंथन


कथाकार मुकेश नौटियाल ने कहा कि मुख्य धारा का हिन्दी साहित्य सिनेमा और उसके गीत संगीत को महज मनोरंजन का माध्यम मानकर उपेक्षित समझता रहता है, लेकिन फिल्मे साहित्य का भरपूर उपयोग करती रही हैं। उन्होने हिन्दी सिनेमा जगत के गीतकारों, स्क्रिप्ट लेखकों और फिल्मकारों पर अधिक लिखने की वकालत की। कथाकार नौटियाल रविवार को रेसकोर्स स्थित आफिसर्स ट्रांजिट में धाद साहित्य एकांश द्वारा आयोजित कार्यक्रम ‘साहिर के बहाने…..’ में वक्ता के तौर पर संबोधित कर रहे थे। धाद साहित्य एकांश ने अपने साहित्यिक कार्यक्रमों की श्रृंखला में सुनील भट्ट की किताब ‘साहिर लुधियानवी- मेरे गीत तुम्हारे’ गोष्ठी का आयोजन किया गया था। ‘साहिर के बहाने’ कार्यक्रम में साहित्य संस्कृति और कला प्रेमियों ने हिन्दी गीत और कविता के संसार की बारीकियों से श्रोताओं को अवगत कराया। कथाकार नौटियाल ने सुनील भट्ट की साहिर पर लिखी किताब को जमीन तोड़ने की कोशिश बताते हुये उन्होने हिन्दी सिनेमा जगत के गीतकारों, स्क्रिप्ट लेखकों और फिल्मकारों पर अधिक लिखने की वकालत की।

वरिष्ठ साहित्यकार असीम शुक्ल ने साहिर लुधियानवी द्वारा रचित साहित्य के विविध पक्षों का विश्लेषण करते हुये साहिर लुधियानवी को कालजयी गीतकार बताया। दून लाइबे्ररी के रिसर्च एसोसिएट मनोज पुंजानी ने हिन्दी फिल्मों में गीतों के प्रभाव को उकेरते हुए साहिर सहित उन तमाम गीतकारों को याद किया जिन्होने अपने अर्थपूर्ण गीतों से श्रोताओं का सम्मान हासिल किया।

रचनाकार सुनील भट्ट ने इस किताब को लिखने के दरमियान हासिल अनुभवों तथा साहिर के गीतों के सामाजिक तथा राजनीतिक सन्दर्भो पर विस्तृत चर्चा की। कार्यक्रम में अर्चना राय हरेन्द्र परिहार और जन संवाद समिति के सांस्कृतिक दल ने साहिर लुधियानवी के गीतों की संगीतमय प्रस्तुति दी।

धाद साहित्य एकांश की सचिव कल्पना बहुगुणा ने सभी आगंतुको का स्वागत करने के साथ ही कहा कि धाद साहित्य एकांश भविष्य में भी इस तरह के आयोजन करता रहेगा। ,अपने सम्बोधन में संस्था के तन्मय ममगाईं ने कहा 20-21 मार्च को देहरादून में बाल-साहित्य पर बड़ा विमर्श आयोजित किया जा रहा है जिसमें भोपाल, दिल्ली, लखनऊ उत्तराखण्ड से उन तमाम साहित्यकारो को बुलाया जा रहा है जिन्होने नई पीढ़ी को सृजनशील बनाने के लिये कुछ अनूठे प्रयोग किये हैं।कार्यक्रम का संचालन करते हुये अवनीश उनियाल ने कहा कि इस तरह के आयोजन समाज में निरन्तर खत्म होती संवेदनशीलता को बचाये रखने के लिये अत्यन्त आवश्यक है।कार्यक्रम में उपस्थिति डा. जयंत नवानी, लोकेश नवानी, नीलम प्रभा वर्मा, सुनीता चैहान, कांता घिल्डियाल, सविता जोशी, नवीन नौटियाल, शांति प्रकाश जिज्ञासु, अंबर खरबन्दा, विजय जुयाल, शोभा रतूडी, डा0 माधुरी बडथ्वाल, दिनेश डबराल, बीना कण्डारी, धिरेन्द्र ध्यानी, डा0 राकेश बलुनी, डा0 रामविनय, रविन्द्र नेगी, तन्मय ममगांई, इन्द्र सिंह नेगी, सतीष बंसल, सुरेन्द्र पुण्डिर, कपिल डोभाल, जितेन भारती, ज्ञानेन्द्र कुमार, बच्चीराम कन्सवाल, सोमवारीलाल उनियाल, संगीता शाह, नदीम बर्नी, सन्तोष डिमरी, बृजमोहन उनियाल, विकास बहुगुणा, डा0 रचना नौटियाल, साकेत रावत आदि उपस्थित थे।


http://tajakhabaruttarakhand.com/newsDetails.aspx


June 15, 2016

साहिर के गीतों को आधार बनाकर रची गई मेरी पुस्तक ‘साहिर लुधियानवी : मेरे गीत तुम्हारे’ के कुछ अंश

फ़िल्मी दुनिया में  साहित्य से जुड़े कई सफल लोगों ने जोर आजमाईश की, पर उन्हें वह सफलता नहीं मिल पाई जो साहिर को नसीब हुयी । इसका एक कारण तो यह था कि ये लोग फिल्म के फॉरमेट को ठीक से पकड़ नहीं पाए । एक फिल्म लेखक या गीतकार को कई बंधनों में रहकर काम करना होता है । उसे फिल्म की  कहानी, पात्रों के परिवेश, नायक-नायिका की  इमेज, प्रचलित गीत-संगीत, निर्माता-निर्देशक की पसंद-नापसंद सबका ख्याल रखना होता है ।  जाहिर है,  इतने बंधनों में रहकर काम करना  काफी मुश्किल है । इसलिए कोई हैरानी यहीं कि जिन लोगों ने साहित्य के क्षेत्र में नाम व शोहरत कमाई, वे मुंबई में चल नहीं पाए और निराश होकर या मोहभंग करा कर वापस चले गए । साहिर के मामले में ऐसा नहीं हुआ क्योंकि उन्होंने फ़िल्मी गीतों की इन सीमाओं को पहचान लिया । उन्होंने इन बंधनों का रोना नहीं रोया, बल्कि  उसे स्वीकार कर लिया । ये बंधन उनकी सीमा-रेखा बन गए । उन्होंने मान लिया कि अब जो भी खेल करना है,  इसी में करना है । और उन्होंने खेल किया और खूब किया 

साहिर के कैरियर के पहले दौर की सफलता का बड़ा कारण उनकी धुनों के हिसाब से गीत लिख पाने की क्षमता थी । धुन की रिदम से मिलते-जुलते शब्द चुनना और उन्हें ऐसे वाक्यों में पिरोना कि एक निश्चित समय-सीमा में फिट हो सकें, एक जटिल काम है । यह काम और भी मुश्किल हो जाता है जब कोई गीतकार अच्छा गीत लिखने की तमन्ना रखता हो । अपने अहसास और विचारों की गहराई को बनी-बनाई धुनों में बांधने का काम साहिर खूब किया और बहुत खूबसूरती से किया । साहिर की इस काव्य प्रतिभा के बारे में फ़िल्मी गीतकार व शायर जां निसार अख्तर कहते हैं, "अल्फ़ाज़ और जज़्बात की खूबसूरती गीतों के लिए बड़ी अहम है । जो धुन साहिर को 'सुन जा दिल की दास्तां' के लिये दी गयी होगी, उस पर 'आ जा, आ जा बलमा' भी दिया जा सकता था, लेकिन यहीं पर एक शायर और तुकबंद का फर्क सामने आता है ।" 

March 27, 2016

हिंदुस्तान, 13 मार्च 2016 में प्रकाशित 'साहिर लुधियानवी : मेरे गीत तुम्हारे' की समीक्षा


जनसत्ता, 27 मार्च 2016 (पृ 7) में 'साहिर लुधियानवी : मेरे गीत तुम्हारे'

पल दो पल के शायर की दास्तान (आउटलुक, अप्रैल11, 2016)

आउटलुक, अप्रैल11, 2016 के अंक में प्रकाशित मेरी पुस्तक “साहिर लुधियानवी: मेरे गीत तुम्हारे” की समीक्षा 


पल दो पल के शायर की दास्तान

(आउटलुक, अप्रैल11, 2016 के अंक में प्रकाशित मेरी पुस्तक “साहिर लुधियानवी: मेरे गीत तुम्हारे” की समीक्षा)

साहिर की ज़ुबान, साहिर की नज़्म, साहिर के गीत, साहिर की कहानियां, अगर साहिर को गिनते रहें तो वक़्त कम लगेगा | हिन्दी और उर्दू को उन्होंने अपनी दो आँखों की तरह प्यार से पाला | यह पुस्तक उसी साहिर के काम को याद दिलाती है | सुनील भट्ट ने जितना संभव हो सका है, साहिर को लफ्जों के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने की कोशिश की है | अलग-अलग संदर्भों के साथ साहिर अपने गीतों के माध्यम से पाठकों से रूबरू होते हैं | सुनील भट्ट ने उन गज़लों को भी यहाँ जगह दी है जो मूल से रूपांतरित होकर फिल्म में आईं हैं | इस किताब को संदर्भ के लिए याद किया जाना चाहिए | हिन्दी में इस तरह की किताबों की हमेशा कमी रही है |

सुनील भट्ट ने साहिर के लोकप्रिय गीतों के साथ उन गीतों-नज़्मों-गज़लों को भी लिया है, जो सन 50 के दौर में उन्होंने लिखी थीं | फिल्म के साल के साथ दी गई इस जानकारी से साहिर को समझना और एक शायर, फिल्मी गीतकार के रूप में उनकी यात्रा को जानना दिलचस्प होगा | उनकी इस रचनात्मक यात्रा में उन्होंने कैसे-कैसे प्यार, देश, रंग-नस्ल, समुदाय पर लिखा और कितना मारक लिखा यह जानकारी महत्वपूर्ण है | सुनील भट्ट ने किताब को इस तरह बाँट दिया है, जिससे यह पता चल सके कि उनकी कलम कैसे समाज पर करारी चोट करती थी | उनके भजनों में भी सांप्रदायिक सौहार्द और अमन की बात खुलकर सामने आती थी | वह एक गीतकार थे या शायर, इस पुस्तक को पढ़ते हुये यह विचार आना लाजिमी है, लेकिन जब विविधताओं से भरी उनकी रचनाएं पढ़ें तो लगता है कि उन्होंने एक गीतकार को शायर से कभी अलग नहीं होने दिया | वह इतने सफल ही इसलिए रहे कि धुन के हिसाब से शब्द लिखने में माहिर थे | वह कहानी के मूल में पहुँच कर उस बिन्दु को पकड़ लेते थे, जहां व्यक्ति फिल्मी कहानी के साथ-साथ संगीत का मज़ा भी लेने लगता है | उनकी फिल्मी पकड़ और समझ ने उन्हें इतनी ख्याति दिलाई | सुनील भट्ट ने साहिर के गीतों से परिचय करने के साथ-साथ उनका परिचय भी पाठकों से कराया है |


सुनील अपनी प्रस्तावना में ही लिखते हैं, अगर हम साहिर के शायर और गीतकार दोनों पहलुओं को मिला दें तो एक विरत व्यक्तित्व सामने आता है, जिस पर अलग से काम करने की पूरी गुंजाइश है | यह वाक्य ही साहिर को समझने के लिए काफी है | क्योंकि आम लोगों के बीच साहिर सिर्फ फिल्मी गीतकार के रूप में ही पहचाने जाते हैं, जबकि साहिर एक उम्दा शायर भी थे | इसी को समझने के लिए इस पुस्तक में उनकी मूल गज़लों, नज़्मों का ज़िक्र भी है, जो बताता है कि उनकी कलम से तराने और शायरी कैसे निर्बाध रूप से बहती थी | हर एक पल के शायर साहिर के लिए फिल्मी गीत लिखना सिर्फ पैसा कमाने का माध्यम कभी नहीं रहा | वह इसे सामाजिक दायित्व भी मानते थे | भट्ट की मेहनत से वह एक सम्पूर्ण रूप से पाठकों तक पहुंचे हैं | हिन्दी पाठकों के लिए यह अच्छी खबर है |   

February 11, 2016

साहिर लुधियानवी : मेरे गीत तुम्हारे Sahir Ludhianvi : Mere Geet Tumhare

मुझे यह बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि साहिर लुधियानवी पर मेरी दूसरी पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है - साहिर लुधियानवी : मेरे गीत तुम्हारे | यह पुस्तक साहिर के गीतों पर मेरे तीन वर्षों के अध्ययन का परिणाम है | इसे स्टार पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया गया है |

साहिर फिल्मी-गीतों को महज मनोरंजन का साधन नहीं मानते थे | उन्होंने अपने गीतों में कई विषयों को उठाया | उन्होंने न सिर्फ सामाजिक बुराइयों पर आघात किया, बल्कि आजाद भारत के हालात, उसके भविष्य की रूपरेखा, धार्मिक सौहार्द, स्त्रियों की स्थिति, वक्त की ताकत, प्रेम की अवधारणा जैसे कई जटिल विषयों पर अपने विचार रखे । साहिर के अलावा शायद ही किसी गीतकार का कैनवास इतना विशाल रहा हो । मौजूदा पुस्तक में इन विषयों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है और साहिर के विचारों को जानने, समझने की कोशिश की गई है |

साहिर ने 115-120 फिल्मों के लिए लगभग सवा से साढ़े सात सौ गीत लिखे । मुझे उनकी 114 फिल्मों के 712 गीतों की जानकारी मिली | इनमें से मुझे 696 गीत उपलब्ध भी हो पाये । प्रस्तुत पुस्तक इन्हीं 696 गीतों का सार है |