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May 21, 2014

दिल खुश है आज उनसे मुलाक़ात हो गयी (ग़जल -1964) Dil khush hai aaj unse mulaqat ho gayi (Ghazal -1964)

दिल खुश है आज उनसे मुलाक़ात हो गयी
गो दूर ही से बात हुई, बात हो गयी |

उनसे हमारा कोई त'आल्लुक़ तो बन गया
बिगड़े भी वो अगर तो बड़ी बात हो गयी |

धड़कन बढ़ी तो साँस की खुशबू बिखर गयी
आँचल उड़ा तो रंग की बरसात हो गयी |

जी चाहता है मान ही लें अब ख़ुदा को हम
जिसका यकीं न था वो क़रामात हो गयी |


[Composer : Madan Mohan, Singer : Md.Rafi, Actor : Sunil Dutt, Meena Kumari]

 

January 06, 2014

मुझे ये फूल न दे तुझको दिलबरी की क़सम (Ghazal -1964) Mujhe ye na phool de tujhko dilbari ki kasam (Ghazal -1964)

मुझे ये फूल  दे तुझको दिलबरी की क़सम
ये कुछ नहीं हैं तेरे होंठों की ताजग़ी की क़सम |

      नज़र हसीं हों तो  जलवे हसीन लगते हैं 
      मैं कुछ नहीं हूँ मुझे मेरे हुस्न ही की क़सम |

तू एक साज़ है छेड़ा नहीं किसी ने जिसे
तेरे बदन में छुपी नर्म रागिनी की क़सम |

       ये रागिनी तेरे दिल में है मेरे तन में नहीं
       परखने वाले मुझे तेरी सादगी की क़सम |

ग़ज़ल का लोच है तू नज़्म का शबाब है तू
यकीन कर मुझे मेरी ही शायरी की क़सम |

[Composer : Madan Mohan, Singer : Md.Rafi, Suman Kalyanpur Actor : Sunil Dutt, Meena Kumari]
 

May 16, 2013

ताज तेरे लिये इक मज़हर-ए-उल्फ़त ही सही (Ghazal -1964) Taj tere liye ek mazhar-e-ulfat hi sahi (Ghazal -1964)

ताज तेरे लिये इक मज़हर--उल्फ़त ही सही
तुम को इस वादी--रंगीं से अक़ीदत ही सही 
मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ से । 

अनगिनत लोगों ने दुनिया में मुहब्बत की है
कौन कहता है कि सादिक़ थे जज़्बे उनके
लेकिन उनके लिये तशहीर का सामान नहीं
क्यों के वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़लिस थे । 

ये चमनज़ार ये जमुना का किनारा, ये महल
ये मुनक़्क़श दर--दीवार, ये महराब ये ताक़
इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर
हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक । 

मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे । 

[Composer : Madan Mohan, Singer : Md. Rafi, Actor : Sunil Dutt, Meena Kumari]


Note on Sahir :  The nazm used in the movie is a part of the original nazm ‘Taj Mahal’, which shot Sahir Ludhianvi to instant fame. He wrote it when he was in Lahore. Alongwith ‘Chakle’ and ‘Parchhaiyan’ this nazm is considered as best work of Sahir till today. In movie only three paragraphs of this nazm were used. The original nazm is given here as under :


ताज तेरे लिये इक मज़हर--उल्फ़त ही सही
तुम को इस वादी--रंगीं से अक़ीदत ही सही

मेरे महबूब ! कहीं और मिला कर मुझ से |
बज़्म--शाही में ग़रीबों का गुज़र क्या मानी
सब्त जिस राह पे हों सतवत--शाही के निशाँ
उस पे उल्फ़त भरी रूहों का सफ़र क्या मानी |

मेरी महबूब पस--पदर्आ--तश्हीर--वफ़ा
तू ने सतवत के निशानों को तो देखा होता
मुर्दा शाहों के मक़ाबिर से बहलने वाली
अपने तारीक मकानों को तो देखा होता |

अनगिनत लोगों ने दुनिया में मुहब्बत की है
कौन कहता है कि सादिक़ थे जज़्बे उन के
लेकिन उन के लिये तश्हीर का सामान नहीं
क्यों के वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़लिस थे |

ये इमारातो-मक़ाबिर ये फ़सीलें, ये हिसार
मुतलक -उल-हुक्म शहंशाहों की अज़मत के सतूं

दामन--दहर पे उस रंग की गुलकारी है
जिस में शामिल है तेरे और मेरे अजदाद का खूं |

मेरी महबूब! उन्हें भी तो मुहब्बत होगी
जिनकी सन्नाई ने बख्शी है इसे शक्ले -जमील
उनके प्यारों के मक़ाबिर रहे बे-नामो-नुमूद
आज तक उन पे जलाई किसी ने क़ंदील  |


ये चमनज़ार ये जमुना का किनारा ये महल
ये मुनक़्क़श दर--दीवार, ये महराब ये ताक़
इक शहनशाह ने दौलत का सहारा ले कर
हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक |

मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे |


रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ (गजल -1964) Rang aur noor ki baarat kise pesh karun (Ghazal -1964)

रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ
ये मुरादों की हसीं रात किसे पेश करूँ |

मैने जज़बात निभाए हैं उसूलों की जगह
अपने अरमान पिरो लाया हूँ फूलों की जगह
तेरे सेहरे की ये सौगात किसे पेश करूँ |

ये मेरे शेर मेरे आखिरी नज़राने हैं
मैं उन अपनों मैं हूँ जो आज से बेगाने हैं
बेतल्लुक सी मुलाकात किसे पेश करूँ |

सुर्ख जोड़े की तबोताब मुबारक हो तुझे
तेरी आँखों का नया ख़्वाब मुबारक हो तुझे
मैं 
ये  ख़्वाहिश, ये ख़यालात किसे पेश करूँ |

कौन कहता है के चाहत पे सभी का हक़ है
तू जिसे चाहे तेरा प्यार उसी का हक़ है
मुझसे कह दे मैं तेरा हाथ किसे पेश करूँ । 

रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ
ये मुरादों की हसीं रात किसे पेश करूँ |

[Composer : Madan Mohan, Singer : Md. Rafi, Actor : Sunil Dutt, Meena Kumari]  


नग़मा-ओ-शेर की सौगात किसे पेश करूँ (ग़ज़ल 1964) Nagma o sher ki baarat kise pesh karun (Ghazal -1964)

नग़मा--शेर की सौगात किसे पेश करूँ
ये छलकते हुए जज्बात किसे पेश करूँ |

शोख़ आँखों के उजालों को लुटाऊं किस पर
मस्त ज़ुल्फ़ों की सियह रात किसे पेश करूँ |

गर्म सांसों में छुपे राज़ बताऊँ किसको
नर्म होठों में दबी बात किसे पेश करूँ |

कोई हमराज़ तो पाऊँ कोई हमदम तो मिले
दिल की धड़कन के इशारात किसे पेश करूँ |

[Composer : Madan Mohan, Singer : Lata Mangeshkar, Actor : Sunil Dutt, Meena Kumari]

इश्क़ की गर्मी-ए-जज़्बात किसे पेश करूँ (ग़ज़ल - 1964) Isq ki garmi e jazbaat kise pesh karun (Ghazal -1964)

इश्क़ की गर्मी--जज़्बात किसे पेश करूँ
ये सुलग़ते हुए दिन-रात किसे पेश करूँ । 

हुस्न और हुस्न का हर नाज़ है पर्दे में अभी
अपनी नज़रों की शिकायात किसे पेश करूँ । 

तेरी आवाज़ के जादू ने जगाया है जिन्हें
वो तस्सव्वुर, वो ख़यालात किसे पेश करूँ । 

मेरी जान--ग़ज़ल, मेरी ईमान--ग़ज़ल
अब सिवा तेरे ये नग़मात किसे पेश करूँ । 

कोई हमराज़ तो पाऊँ कोई हमदम तो मिले
दिल की धड़कन के इशारात किसे पेश करूँ । 

[Composer : Madan Mohan, Singer : Md. Rafi, Actor : Sunil Dutt, Meena Kumari]