June 01, 2016

तुमको देखा तो समझ में आया (दीदार-ए-यार- 1982) Tumko dekha to samajh me aaya (Deedar-e-Yaar - 1982)

तुमको देखा तो समझ में आया
लोग क्यों बुत को खुदा मानते हैं
बुत में बुतगर की झलक होती है
इसको छूकर उसे पहचानते हैं
पहले अंजान थे, अब जानते हैं
तुमको देखा तो समझ में आया

तुमको देखा तो ये मालूम हुआ,
लोग क्यों इश्क़ में दीवाने बने
ताज छोड़े गए और तख्त लुटे
कैस-ओ-फरहाद के अफसाने बने
पहले अंजान थे, अब जानते हैं
लोग क्यों बुत को खुदा मानते हैं
तुमको देखा तो ये समझ में आया

तुमको देखा तो ये अहसास हुआ
ऐसे बुत भी हैं जो लब खोलते हैं
जिनकी अंगड़ाइयां पर तोलती हैं
जिनके शादाब बदन  बोलते हैं
पहले अंजान थे, अब जानते हैं
लोग क्यों बुत को खुदा मानते हैं
तुमको देखा तो ये समझ में आया

हुस्न के जलवा-ए-रंगीं में खुदा होता है
हुस्न के सामने सजदा भी रवां होता है
दीन-ए-उल्फ़त में यही रस्म चली आई है
लोग इसे कुफ़्र भी कहते हों तो क्या होता है
 पहले अंजान थे, अब जानते हैं
लोग क्यों बुत को खुदा मानते हैं
तुमको देखा तो ये समझ में आया

(Composer : Laxmikant Pyarelal, Singer : Lata Mangeshkar, Director : H S Rawal, Producer:  Prasan Kapoor,  Actor : Rishi Kapoor, Tina Munim)

April 27, 2016

वतन की आबरू खतरे में है, हुशियार हो जाओ

वतन की आबरू खतरे में है, हुशियार हो जाओ
हमारे इम्तहां का वक़्त है, तैयार हो जाओ

हमारी सरहदों पर खून बहता हैं जवानों का
हुआ जाता है दिल छलनी हिमाला की चट्टानों का
उठो रुख फेर दो दुश्मन की तोपों के दहानों का
वतन की सरहदों पर आहनी दीवार हो जाओ
हुशियार हो जाओ, वतन की आबरू खतरे में है

वो जिनको सादगी में हमने आँखों पर बिठाया था
जो जिनको भाई कहकर हमने सीने से लगाया था
वो जिनकी गरदनों में हार बाहों का पहनाया था
अब उनकी गरदनों के वास्ते तलवार हो जाओ
हुशियार हो जाओ, वतन की आबरू खतरे में है

न हम इस वक़्त हिन्दू हैं न मुस्लिम हैं न ईसाई
अगर कुछ हैं तो हैं इस देश, इस धरती के शैदाई
इसी को ज़िंदगी देंगे, इसी से ज़िंदगी पाई
लहू के रंग से लिखा हुआ इकरार हो जाओ
वतन की आबरू खतरे में है, हुशियार हो जाओ

खबर रखना कोई गद्दार साजिश कर नहीं पाये
नजर रखना कोई ज़ालिम तिजोरी भर नहीं पाये
हमारी कौम पर तारीख तोहमत धर नहीं पाये
वतन-दुश्मन दरिंदों के लिए ललकार हो जाओ
वतन की आबरू खतरे में है, हुशियार हो जाओ

NOTE ON SAHIR : यह गीत साहिर ने 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान लिखा था | इसका संगीत खैय्याम साहब ने दिया था |
 

March 27, 2016

हिंदुस्तान, 13 मार्च 2016 में प्रकाशित 'साहिर लुधियानवी : मेरे गीत तुम्हारे' की समीक्षा


जनसत्ता, 27 मार्च 2016 (पृ 7) में 'साहिर लुधियानवी : मेरे गीत तुम्हारे'

पल दो पल के शायर की दास्तान (आउटलुक, अप्रैल11, 2016)

आउटलुक, अप्रैल11, 2016 के अंक में प्रकाशित मेरी पुस्तक “साहिर लुधियानवी: मेरे गीत तुम्हारे” की समीक्षा 


पल दो पल के शायर की दास्तान

(आउटलुक, अप्रैल11, 2016 के अंक में प्रकाशित मेरी पुस्तक “साहिर लुधियानवी: मेरे गीत तुम्हारे” की समीक्षा)

साहिर की ज़ुबान, साहिर की नज़्म, साहिर के गीत, साहिर की कहानियां, अगर साहिर को गिनते रहें तो वक़्त कम लगेगा | हिन्दी और उर्दू को उन्होंने अपनी दो आँखों की तरह प्यार से पाला | यह पुस्तक उसी साहिर के काम को याद दिलाती है | सुनील भट्ट ने जितना संभव हो सका है, साहिर को लफ्जों के माध्यम से पाठकों तक पहुँचने की कोशिश की है | अलग-अलग संदर्भों के साथ साहिर अपने गीतों के माध्यम से पाठकों से रूबरू होते हैं | सुनील भट्ट ने उन गज़लों को भी यहाँ जगह दी है जो मूल से रूपांतरित होकर फिल्म में आईं हैं | इस किताब को संदर्भ के लिए याद किया जाना चाहिए | हिन्दी में इस तरह की किताबों की हमेशा कमी रही है |

सुनील भट्ट ने साहिर के लोकप्रिय गीतों के साथ उन गीतों-नज़्मों-गज़लों को भी लिया है, जो सन 50 के दौर में उन्होंने लिखी थीं | फिल्म के साल के साथ दी गई इस जानकारी से साहिर को समझना और एक शायर, फिल्मी गीतकार के रूप में उनकी यात्रा को जानना दिलचस्प होगा | उनकी इस रचनात्मक यात्रा में उन्होंने कैसे-कैसे प्यार, देश, रंग-नस्ल, समुदाय पर लिखा और कितना मारक लिखा यह जानकारी महत्वपूर्ण है | सुनील भट्ट ने किताब को इस तरह बाँट दिया है, जिससे यह पता चल सके कि उनकी कलम कैसे समाज पर करारी चोट करती थी | उनके भजनों में भी सांप्रदायिक सौहार्द और अमन की बात खुलकर सामने आती थी | वह एक गीतकार थे या शायर, इस पुस्तक को पढ़ते हुये यह विचार आना लाजिमी है, लेकिन जब विविधताओं से भरी उनकी रचनाएं पढ़ें तो लगता है कि उन्होंने एक गीतकार को शायर से कभी अलग नहीं होने दिया | वह इतने सफल ही इसलिए रहे कि धुन के हिसाब से शब्द लिखने में माहिर थे | वह कहानी के मूल में पहुँच कर उस बिन्दु को पकड़ लेते थे, जहां व्यक्ति फिल्मी कहानी के साथ-साथ संगीत का मज़ा भी लेने लगता है | उनकी फिल्मी पकड़ और समझ ने उन्हें इतनी ख्याति दिलाई | सुनील भट्ट ने साहिर के गीतों से परिचय करने के साथ-साथ उनका परिचय भी पाठकों से कराया है |


सुनील अपनी प्रस्तावना में ही लिखते हैं, अगर हम साहिर के शायर और गीतकार दोनों पहलुओं को मिला दें तो एक विरत व्यक्तित्व सामने आता है, जिस पर अलग से काम करने की पूरी गुंजाइश है | यह वाक्य ही साहिर को समझने के लिए काफी है | क्योंकि आम लोगों के बीच साहिर सिर्फ फिल्मी गीतकार के रूप में ही पहचाने जाते हैं, जबकि साहिर एक उम्दा शायर भी थे | इसी को समझने के लिए इस पुस्तक में उनकी मूल गज़लों, नज़्मों का ज़िक्र भी है, जो बताता है कि उनकी कलम से तराने और शायरी कैसे निर्बाध रूप से बहती थी | हर एक पल के शायर साहिर के लिए फिल्मी गीत लिखना सिर्फ पैसा कमाने का माध्यम कभी नहीं रहा | वह इसे सामाजिक दायित्व भी मानते थे | भट्ट की मेहनत से वह एक सम्पूर्ण रूप से पाठकों तक पहुंचे हैं | हिन्दी पाठकों के लिए यह अच्छी खबर है |   

February 11, 2016

साहिर लुधियानवी : मेरे गीत तुम्हारे Sahir Ludhianvi : Mere Geet Tumhare

मुझे यह बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि साहिर लुधियानवी पर मेरी दूसरी पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है - साहिर लुधियानवी : मेरे गीत तुम्हारे | यह पुस्तक साहिर के गीतों पर मेरे तीन वर्षों के अध्ययन का परिणाम है | इसे स्टार पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया गया है |

साहिर फिल्मी-गीतों को महज मनोरंजन का साधन नहीं मानते थे | उन्होंने अपने गीतों में कई विषयों को उठाया | उन्होंने न सिर्फ सामाजिक बुराइयों पर घात किया, बल्कि आजाद भारत के हालात, उसके भविष्य की रूपरेखा, धार्मिक सौहार्द, स्त्रियों की स्थिति, वक्त की ताकत, प्रेम की अवधारणा जैसे कई जटिल विषयों पर अपने विचार रखे । साहिर के अलावा शायद ही किसी गीतकार का कैनवास इतना विशाल रहा हो । मौजूदा पुस्तक में इन विषयों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है और साहिर के विचारों को जानने, समझने की कोशिश की गई है |

साहिर ने 115-120 फिल्मों के लिए लगभग सवा से साढ़े सात सौ गीत लिखे । मुझे उनकी 114 फिल्मों के 712 गीतों की जानकारी मिली | इनमें से मुझे 696 गीत उपलब्ध भी हो पाये । प्रस्तुत पुस्तक इन्हीं 696 गीतों का सार है |