May 16, 2013

छू लेने दो नाज़ुक होठों को (काजल -1965) Choo lene do nazuk hontho ko (Kaajal -1965)

छू लेने दो नाज़ुक होठों को, कुछ और नहीं हैं जाम हैं ये
क़ुदरत ने जो हमको बख़्शा है, वो सबसे हसीं ईनाम हैं ये |

शरमा के यूँ ही खो देना, रंगीन जवानी की घड़ियाँ
बेताब धड़कते सीनों का, अरमान भरा पैगाम है ये  |

अच्छों को बुरा साबित करना, दुनिया की पुरानी आदत है
इस मै को मुबारक चीज़ समझ, माना कि बहुत बदनाम है ये  | 

[Composer : Ravi, Singer : Md.Rafi, Production : Kalpanalok; Direction :Ram MaheshwaryActor : Raj Kumar, Meena Kumari]



ताज तेरे लिये इक मज़हर-ए-उल्फ़त ही सही (Ghazal -1964) Taj tere liye ek mazhar-e-ulfat hi sahi (Ghazal -1964)

ताज तेरे लिये इक मज़हर--उल्फ़त ही सही
तुम को इस वादी--रंगीं से अक़ीदत ही सही 
मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ से । 

अनगिनत लोगों ने दुनिया में मुहब्बत की है
कौन कहता है कि सादिक़ थे जज़्बे उनके
लेकिन उनके लिये तशहीर का सामान नहीं
क्यों के वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़लिस थे । 

ये चमनज़ार ये जमुना का किनारा, ये महल
ये मुनक़्क़श दर--दीवार, ये महराब ये ताक़
इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर
हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक । 

मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे । 

[Composer : Madan Mohan, Singer : Md. Rafi, Actor : Sunil Dutt, Meena Kumari]


Note on Sahir :  The nazm used in the movie is a part of the original nazm ‘Taj Mahal’, which shot Sahir Ludhianvi to instant fame. He wrote it when he was in Lahore. Alongwith ‘Chakle’ and ‘Parchhaiyan’ this nazm is considered as best work of Sahir till today. In movie only three paragraphs of this nazm were used. The original nazm is given here as under :


ताज तेरे लिये इक मज़हर--उल्फ़त ही सही
तुम को इस वादी--रंगीं से अक़ीदत ही सही

मेरे महबूब ! कहीं और मिला कर मुझ से |
बज़्म--शाही में ग़रीबों का गुज़र क्या मानी
सब्त जिस राह पे हों सतवत--शाही के निशाँ
उस पे उल्फ़त भरी रूहों का सफ़र क्या मानी |

मेरी महबूब पस--पदर्आ--तश्हीर--वफ़ा
तू ने सतवत के निशानों को तो देखा होता
मुर्दा शाहों के मक़ाबिर से बहलने वाली
अपने तारीक मकानों को तो देखा होता |

अनगिनत लोगों ने दुनिया में मुहब्बत की है
कौन कहता है कि सादिक़ थे जज़्बे उन के
लेकिन उन के लिये तश्हीर का सामान नहीं
क्यों के वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़लिस थे |

ये इमारातो-मक़ाबिर ये फ़सीलें, ये हिसार
मुतलक -उल-हुक्म शहंशाहों की अज़मत के सतूं

दामन--दहर पे उस रंग की गुलकारी है
जिस में शामिल है तेरे और मेरे अजदाद का खूं |

मेरी महबूब! उन्हें भी तो मुहब्बत होगी
जिनकी सन्नाई ने बख्शी है इसे शक्ले -जमील
उनके प्यारों के मक़ाबिर रहे बे-नामो-नुमूद
आज तक उन पे जलाई किसी ने क़ंदील  |


ये चमनज़ार ये जमुना का किनारा ये महल
ये मुनक़्क़श दर--दीवार, ये महराब ये ताक़
इक शहनशाह ने दौलत का सहारा ले कर
हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक |

मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे |


रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ (गजल -1964) Rang aur noor ki baarat kise pesh karun (Ghazal -1964)

रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ
ये मुरादों की हसीं रात किसे पेश करूँ |

मैने जज़बात निभाए हैं उसूलों की जगह
अपने अरमान पिरो लाया हूँ फूलों की जगह
तेरे सेहरे की ये सौगात किसे पेश करूँ |

ये मेरे शेर मेरे आखिरी नज़राने हैं
मैं उन अपनों मैं हूँ जो आज से बेगाने हैं
बेतल्लुक सी मुलाकात किसे पेश करूँ |

सुर्ख जोड़े की तबोताब मुबारक हो तुझे
तेरी आँखों का नया ख़्वाब मुबारक हो तुझे
मैं 
ये  ख़्वाहिश, ये ख़यालात किसे पेश करूँ |

कौन कहता है के चाहत पे सभी का हक़ है
तू जिसे चाहे तेरा प्यार उसी का हक़ है
मुझसे कह दे मैं तेरा हाथ किसे पेश करूँ । 

रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ
ये मुरादों की हसीं रात किसे पेश करूँ |

[Composer : Madan Mohan, Singer : Md. Rafi, Actor : Sunil Dutt, Meena Kumari]  


नग़मा-ओ-शेर की सौगात किसे पेश करूँ (ग़ज़ल 1964) Nagma o sher ki baarat kise pesh karun (Ghazal -1964)

नग़मा--शेर की सौगात किसे पेश करूँ
ये छलकते हुए जज्बात किसे पेश करूँ |

शोख़ आँखों के उजालों को लुटाऊं किस पर
मस्त ज़ुल्फ़ों की सियह रात किसे पेश करूँ |

गर्म सांसों में छुपे राज़ बताऊँ किसको
नर्म होठों में दबी बात किसे पेश करूँ |

कोई हमराज़ तो पाऊँ कोई हमदम तो मिले
दिल की धड़कन के इशारात किसे पेश करूँ |

[Composer : Madan Mohan, Singer : Lata Mangeshkar, Actor : Sunil Dutt, Meena Kumari]

इश्क़ की गर्मी-ए-जज़्बात किसे पेश करूँ (ग़ज़ल - 1964) Isq ki garmi e jazbaat kise pesh karun (Ghazal -1964)

इश्क़ की गर्मी--जज़्बात किसे पेश करूँ
ये सुलग़ते हुए दिन-रात किसे पेश करूँ । 

हुस्न और हुस्न का हर नाज़ है पर्दे में अभी
अपनी नज़रों की शिकायात किसे पेश करूँ । 

तेरी आवाज़ के जादू ने जगाया है जिन्हें
वो तस्सव्वुर, वो ख़यालात किसे पेश करूँ । 

मेरी जान--ग़ज़ल, मेरी ईमान--ग़ज़ल
अब सिवा तेरे ये नग़मात किसे पेश करूँ । 

कोई हमराज़ तो पाऊँ कोई हमदम तो मिले
दिल की धड़कन के इशारात किसे पेश करूँ । 

[Composer : Madan Mohan, Singer : Md. Rafi, Actor : Sunil Dutt, Meena Kumari]

May 14, 2013

मेरे नदीम मेरे हमसफ़र उदास न हो (भाई बहन-1959) mere nadeem mere humsafar udas na ho (Bhai Bahen -1959)

मेरे नदीम, मेरे हमसफ़र उदास हो
कठिन सही तेरी मंजिल उदास हो

हर इक तलाश  के रस्ते में मुश्किलें हैं मगर 
हर इक तलाश मुरादों के फूल लाती है 
हज़ार चाँद-सितारों का खून होता है 
तो एक सुबह फिजाओं में मुस्कुराती है 
मेरे नदीम, मेरे हमसफ़र....

कदम-कदम पे चट्टानें खड़ी रहें लेकिन
जो चल निकलते हैं दरिया तो फिर नहीं रुकते
हवाएं जितना भी टकरायें आंधियाँ बनकर
मगर घटाओं के परचम कभी नहीं झुकते
मेरे नदीम, मेरे हमसफ़र....

जो अपने खून को पानी बना नहीं सकते 
वो जिंदगी में नया रंग ला नहीं सकते
जो रास्तों के अंधेरे से हार जाते हैं
वो मंजिलों के उजालों को पा नहीं सकते
मेरे नदीम मेरे हमसफ़र....

[Composer : N.Dutta, Singer : Sudha Malhotra]